Satna News: अपने घर के पुरुषों की 'रबर स्टाम्प' बनीं सतना शहर की महिला पार्षद
महिलाओं के नाम पर पुरुषों ने जीता चुनाव, उन्हीं के नाम पर चला रहे 'अपनी सरकार'
सतना। महिला आरक्षण विधेयक भले ही लोकसभा में पारित नहीं हो पाया हो लेकिन हर जगह यह बहस का विषय है, कि महिलाओं को आरक्षण मिले। वहीं यह भी चर्चा जारी है, कि जब महिलाएं पुरुषों के बराबर हैं, महिलाएं किसी क्षेत्र में कम नहीं है तो फिर उन्हें आरक्षण जैसी सुविधा क्यों मिलनी चाहिए?
आरक्षण की बैसाखी क्यों?
महिला आरक्षण पर एक पुरुष ने इस प्रतिनिधि से चर्चा में अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि ये महिलाएं सुबह उठने से लेकर रात में जब तक आदमी बिस्तर पर नहीं पहुंच जाता नाक में दम कर देती हैं। इसके बाद भी इन महिलाओं को आरक्षण की बैसाखी क्यों चाहिए? जो हुनरमंद हैं, जो योग्य हैं, वे न सिर्फ बड़े-बड़े पदों पर आसीन हैं, बल्कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीत रही हैं। कई राज्यों में तो महिलाओं ने बतौर मुख्यमंत्री के रूप में प्रतिनिधित्व किया है। उत्तर प्रदेश में मायावती और ममता बनर्जी इसका जीवन्त उदाहरण हैं।
सिर्फ नाम की प्रतिनिधि
नि:संदेह, तमाम राजनीतिक घराने अपने घर की महिलाओं को आगे करके सत्ता सुख भोगने का प्रयास करते रहते हैं । छोटे स्तर के पदों में ये ज्यादा दिखता है। जैसे पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में ज्यादातर महिला उम्मीदवार महज रबर स्टाम्प जैसी होती हैं। जब कोई सीट महिलाओं के नाम पर आरक्षित हो जाती है तो प्राय: उस क्षेत्र के नेता की बहू -बेटी, पत्नी को चुनावी मैदान में उतार दिया जाता है और विजयी होने के बाद असल सत्ता सुख उसके घर का पुरुष लेता है।
आंकड़े चिंताजनक
सतना शहर की ही बात करें तो यहां 45 वार्ड हैं, लिहाजा 45 पार्षद हैं। इनमें तकरीबन 50 प्रतिशत महिला पार्षद हैं । कुल 45 वार्ड में 24 महिलाएं पार्षद हैं। इन महिला नेताओं की हकीकत यह है, कि इनमें से पांच महिलाएं भी ऐसी नहीं हैं जो स्वयं के दम पर राजनीति करती हों । इस विशेष रिपोर्ट में हम सतना शहर की सभी महिला पार्षदों की वास्तविक सियासी दशा से आपको अवगत करा रहे हैं।
खुद के दम पर राजनीति कर रहीं मीना माधव
शहर के वार्ड नंबर 1 से निर्दलीय पार्षद के रूप में मीना माधव जीतीं। पूरे सतना शहर में ये इकलौती ऐसी पार्षद हंै जो अपने दम पर राजनीति करती हैं, नगर निगम खुद जाती हैं। विकास कार्यों के लिए लड़ाई लड़नी है महिला नेता के रूप में उनके अंदर वे सारी क्षमताएं और प्रतिभा है जो एक वास्तविक नेता में होनी चाहिए। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को ऐसे नेताओं की शायद जरूरत नहीं। हो सकता है इसी कारण भारतीय जनता पार्टी ने उनकी टिकट काट दी थी। भारतीय जनता पार्टी को परिक्रमा लगाने वाले, चमचागिरी करने वाले नेताओं की जरूरत होती है। मीना माधव ने ऐसा नहीं किया। मीना माधव अपने पराक्रम के दम पर वार्ड नंबर 1 का चुनाव जीतीं और आज भी मीना माधव के नाम से नगर निगम में दहशत है। चाहे वह कर्मचारी हो, चाहे वह अधिकारी हो या नेता हो। वार्ड के रहवासी का कोई भी काम नगर निगम में रुकने नहीं पाता है। यदि किसी महिला को राजनीति में रुचि है तो मीना माधव की तरह राजनीति करनी चाहिए। न कि अपने पति, बेटे या भाई के सहारे।
वार्ड 2 से 8 तक
सतना शहर के वार्ड नंबर 2 से कांग्रेस की शहनाज बेगम पार्षद हैं। ये राजनीति में कितना सक्रिय हैं, नगर निगम कितनी बार गई हैं, जनता की परेशानियों से कितना अवगत हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। अब जिनकी राजनीति में रुचि नहीं है उसके बाद भी महिलाओं को जबरदस्ती उनके पति चुनाव मैदान में उतारकर उन्हें पार्षद बना दें, इसका क्या मतलब? इसी तरह, वार्ड नंबर 5 की बात करते हैं। वार्ड नंबर 5 से सुषमा तिवारी जो कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीती थीं, वार्ड और नगर निगम का पूरा काम उनके पति देखते हैं। वार्ड नंबर 8 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर पार्षद बनीं मंजू यादव नगर निगम कितनी बार गई हैं, ये बात उनके वार्ड की जनता भी जानती है और नगर निगम से जुड़े हुए लोग भी जानते होंगे। इनका पूरा कामधाम उनके बेटे देखते हैं।
वार्ड 9 से 19 तक
वार्ड क्रमांक 9 से कक्षा देवी तिवारी चुनाव जीती हैं उनके पति उनका काम देखते हैं। नगर निगम आना-जाना, विकास कार्य, जनता से जुड़ी हुई हर बात उनके पति ही निपटाते हैं। वार्ड नंबर 10 से कांग्रेस की टिकट पर कमल सिंह पार्षद चुनाव जीती हैं। कमल सिंह का पूरा कामकाज उनके बेटे राजदीप सिंह देखते हैं। वार्ड नंबर 15 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर ममता सोनी पार्षद हैं, लेकिन इनका पूरा कामकाज उनके पति मुरारी सोनी देखते हैं। वार्ड नंबर 16 से सुनीता चौधरी भले ही पार्षद हैं, लेकिन इनका कामकाज उनके पति सुरेंद्र चौधरी देखते हैं। वार्ड नंबर 17 से उषा कुशवाहा को जनता ने पार्षद बनाया, लेकिन उनका पूरा कामकाज उनके पति गंगा कुशवाहा देखते हैं। वार्ड नंबर 18 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर मनीषा सिंह पार्षद हैं, लेकिन कामधाम उनके पति अजय सिंह मिंटू देखते हैं। इसी प्रकार वार्ड नंबर 19 से सुमन वाल्मीकि पार्षद हैं, पर उनका सारा कामकाज उनके पति देखते हैं।
वार्ड 22 से 25 तक
सतना शहर के वार्ड नंबर 22 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर सुनीता कुशवाहा पार्षद हैं, लेकिन कामकाज उनके पति राजेंद्र कुशवाहा देखते हैं। वार्ड नंबर 23 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर कुसुम कली शुक्ला चुनाव जीती थीं, लेकिन कामकाज उनके बेटे नीरज शुक्ला देखते हैं। इसी प्रकार वार्ड नंबर 24 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर प्राची कुशवाहा पार्षद हैं, पर उनकी पार्षदी का सारा कामकाज उनके पति पुष्पराज कुशवाहा देखते हैं। वार्ड नंबर 25 के हाल भी कुछ इसी तरह हैं। यहां नम्रता सिंह पार्षद हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि नम्रता सिंह पढ़ी-लिखी महिला हैं। जब भी परिषद में अपनी बात रखनी होती है तो वे बड़े सलीके से और टू द पॉइंट बात करती हंै, लेकिन जहां कामकाज देखने की बात की जाए, तो कामकाज नम्रता सिंह भी नहीं देखती हैं। उनकी पार्षदी के कामकाज देखते हैं उनके पति सुशील सिंह मुन्ना।
वार्ड 28 से 44 तक
महिलाओं के नाम पर जीते गए चुनाव और उनके नाम पर उनके घर के पुरुष सियासत करते हैं। इस फेहरिश्त में सतना शहर का वार्ड नंबर 28 भी है, जहां निर्दलीय पार्षद के रूप में चुनी गई थीं सुषमा सिंह लोधी। बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं। उनके कामकाज उनके पति भगवान सिंह देखते हैं। वार्ड नंबर 29 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर रानी शुक्ला चुनाव जीती हैं। वार्ड नंबर 31 से रजनी तिवारी कांग्रेस की टिकट पर चुनी गईं, लेकिन कामकाज उनके पति रामकुमार तिवारी देखते हैं। इसी प्रकार वार्ड नंबर 34 से भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर कुसुम चुनाव जीतीं, किन्तु उनका सारा कामकाज उनके पति बाल्मिक देखते हैं। वार्ड नंबर 35 से प्रवीण सिंह पार्षद हैं, लेकिन उनका काम उनके पति आशुतोष सिंह देखते हैं। वार्ड नंबर 39 से डोली वाल्मीकि चुनाव जीती हैं, लेकिन कामकाज उनके पति कमल बाल्मिक देखते हैं। इसी प्रकार वार्ड नंबर 42 से वंदना सिंह पार्षद हैं, किन्तु उनका सारा कामकाज उनके पति प्रसेनजीत सिंह देखते हैं। यही हाल हैं शहर के वार्ड नंबर 44 के, जहां पार्षद तो अर्चना गुप्ता हैं, लेकिन उनका सारा काम उनके पति अनिल गुप्ता देखते हैं।
समग्र सुधार जरूरी
इस प्रकार, 'शहर की संसद' याने सतना नगर निगम के 24 महिला पार्षदों में सिर्फ एक पार्षद मीना माधव हैं, जो अपने दम पर राजनीति करती हैं। उनके अलावा जितनी भी पार्षद हैं, किसी का बेटा तो किसी का पति, उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में, राजनीति में महिला आरक्षण और महिला प्रतिनिधियों की स्थिति पर कई सवालिया निशान खड़े होते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है, कि महिला आरक्षण के साथ ही महिलाओं के शैक्षणिक, सुरक्षात्मक और सामाजिक स्तर में इस कदर सुधार की जरूरत है, कि महिलाएं वाकय में पूर्ण आत्मनिर्भर और मजबूत बन सकें।