'साहब सलाम' के पीछे रीवा महाराज का शाही खबास !

- निरंजन शर्मा

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साहब सलाम दादा। 
बघेलखंड ; रीवा, सीधी, सतना, मऊगंज, बैढ़न, व्यौहारी, उमरिया, अनूपपुर और मैहर आदि में यह अभिवादन आम है।

 


खासतौर से क्षत्रिय युवकों और शख्सियतों से अभिवादन करते समय; आते-जाते, मिलते-जुलते 'साहब सलाम' का अभिवादन आज भी काफी चलता है। पहले तो बहुत ज्यादा चलता था। वास्तव में, साहब सलाम का अभिवादन गौरवान्वित करने वाला था।

 


जुलाई 1979 में जब मैंने टीकमगढ़ से बीकॉम फाइनल उत्तीर्ण करने के बाद रीवा टीआरएस कॉलेज में लॉ प्रथम वर्ष में दाखिला लिया तो प्रवेश प्रक्रिया के दौरान देखा कि साहब सलाम सर्वाधिक चलन में था। कई लड़के साहब सलाम कहकर पैर भी पड़ते थे।

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आमजन की कौन कहे ; उस अंतराल में रीवा महाराज मार्तण्ड सिंह जू देव को भी मैंने एक कार्यक्रम में लगातार लोगों से  'साहब सलाम' करते देखा-सुना। मैंने भी अपना सबसे पहला 'साहब सलाम' रीवा में अपने मोहल्ले नरेन्द्रनगर में ही रहने वाले अपने सहपाठी कमलेश दादा (श्री कमलेश्वर सिंह बघेल) से किया। शीघ्र ही मैं 'साहब सलाम' का अभ्यस्त हो गया क्योंकि कमलेश दादा के आसपास जितने भी शागिर्द थे सब साहब सलाम वाले थे। कई बार मुझसे भी लोग साहब सलाम करते।

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आज हिंदू विश्वविद्यालय, काशी के लेखक श्री बलदेव उपाध्याय की सन 1953 में प्रकाशित कृति  'भागवत संप्रदाय' पढ़ते हुए साहब सलाम के बारे में काफी कुछ गुत्थी सुलझ गई कि राम और लक्ष्मण को गद्दीनशीन कर अपनी सत्ता चलाने वाले एक राज-समाज में 'साहब सलाम' शब्द कहां से आया और कैसे इतना ज्यादा चलन में आ गया।


सन 1140 के आसपास स्थापित होने वाली एक हिन्दू रियासत बांधवगढ़ में 16वीं शताब्दी के मध्यकाल में साहब सलाम फैलाने वाला एक शाही खबास (नाई) था। वह वैद्यकी का भी जानकार था। इस नापित का नाम था भगत सेन।

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रीवा के महाराज रघुराज सिंह ने अपने ग्रंथ भक्तमाल - राम- रसकावली में उस शाही नाई के समय राज करने वाले अपने पूर्वज महाराज का नाम राजाराम बतलाया है-
 

बांधवगढ़ पूरब सो गायो।
सेन नाम नापित तहां जायो।
ताकी रहै सदा यह रीता, 
करत रहे साधुन सों प्रीता। 
तहां को राजाराम बघेला, 
बरन्यो जेहि कबीर को चेला।
करै सदा तिनकी सेवकाई, 
मुकुर दिखावै तेल लगाई।

रघुराज सिंह महाराज ने इस छंद में साधुओं से प्रेम करने वाले एक नाई के बारे में बताया है कि वह बांधवगढ़ के राजा राजाराम के यहां उनकी सेवकाई करता है। 'मुकर दिखावै तेल लगाई।' दर्पण दिखा के तेल लगाता है अथवा तेल लगाकर दर्पण दिखाता है। लेकिन यह सेन भगत साधारण नहीं थे।

16वीं सदी के एक महान संत नाभादास ने सेन भगत के बारे में एक छप्पय में कहा है-
प्रभु दास के काज रूप नापित को कीनो। 
छिप्र, छुरहरी गही, पानि दर्पन तहां लीनो।
ता दशद्वै तिह काल, भूप को तेल लगायो। उलट राव भयो शिष्य, प्रगट परचौ जब पायौ।
श्याम रहत सन्मुख सदा ज्यों बछरा हित धेन के।
विदित बात जग जानिए हरि भए सहायक सेन के।

नाभा जी कहते हैं कि  'हरि भए सहायक सेन के'।  नाभा जी यह स्वीकारते हैं कि श्याम (हरि) स्वयं सेन के सहायक बने और जब राजा को पता चला कि यह तो स्वयं हरि हैं तो  'उलट राव भयो शिष्य' यानी वह राजा स्वयं भक्त सेन का शिष्य हो गया। 


इस छप्पय में निर्दिष्ट राजा बांधवगढ़ के नरेश थे ; इसका परिचय एक और संत प्रिया दास की टीका से लगता है-
बांधौगढ़ वास, हरि साधु सेवा आस लागी, 
पगी मति अति प्रभु परचो दिखायो है।
करि नित नेम चल्यो, भूप को लगाऊं तेल,
भयो मग मेल संत फिरि घर आयो है।
टहल बनायो करी नृप की न शंक घेरी,
धरि उर श्याम जाय भूपति रिझायो है। 
पाछे सेन गयौ, पूछे, हियरंग छयो।
भयो अचरज राजा वचन सुनायो है।

भक्त सेन जो सेन भगत के रूप में इतिहास में दर्ज हैं, उनका महत्तम बड़ा है। उन्हें स्वामी रामानंद का शिष्य और कबीर का साथी माना जाता है। यह बात तो जग प्रसिद्ध है कि कबीर का रीवा खासतौर से बांधवगढ़ से रिश्ता कुछ खास रहा है।  बांधवगढ़ किले में उनके नाम से कई स्थान हैं। एक कबीर की गुफा है जिसमें बैठकर कबीर अपने शिष्यों को संबोधित करते थे । कबीर के बाद उनकी गद्दी पर धर्मदास नाम का बांधवगढ़ का एक सेठ ही बैठा । इस सेठ को महात्मा धर्मदास कहा जाता है जो कि कबीरपंथी हो गया था। 


अब सवाल यह है कि रीवा का वह राजा कौन था जो अपने नापित को हरि का अवतार मानकर उसका शिष्य हो गया था तो इस सवाल का जवाब पुस्तक में राजाराम बघेल का नाम देकर बताया गया है ।  'बांधवगढ़ रीवा के राजा राजाराम का दूसरा नाम रामचंद्र बतलाया जाता है । यह राजा वीरभानु के पुत्र थे । इनका राज्य समय सन 1544 से सन 1591 तक था।'


सेन नापित का आविर्भाव काल भी 16वीं सदी  का यही उत्तरार्ध माना जाता है । रीवा राज्य का यह शाही खबास अपने आध्यात्मिक ज्ञान से कबीर दास और उनके गुरु स्वामी रामानंद तक पहुंच रखता था।  'भक्तमाल' में तो भगत सेन को हरि का अवतार ही माना गया है। सिखों के गुरु कहे जाने वाले गुरु ग्रंथ साहब में भगत सेन का भी एक शबद रखा गया है- 
धूप दीप घ्रित साज आरती 
धारने जाऊं कमलापती...।

इस दिव्य भगत सेन के जीवन काल में रीवा (बांधवगढ़़) में साहब सलाम का अभिवादन न केवल शुरू हुआ बल्कि आज पांच शताब्दियों के बाद भी जारी है । जब राजा ही भगत सेन को हरि का रूप मानकर उनका शिष्य हो गया तो शिष्य को तो साहब सलाम कहना ही था। 


भगत सेन के बारे में कहा जाता है कि वह पंजाब के तरणतारण में पैदा हुए और किशोरावस्था में ही अपने पिता के देहांत की वजह से वह बांधवगढ़ राज्य आ गए जहां उनका मामा शाही नाई था। भगत सेन ने लाहौर में उस्ताद अजीम से नाई और नसें चटकाने का काम सीखा था और वह जल्दी ही शरीर विज्ञान के सिद्धहस्त हो गए थे। इसी भगत सेन ने रीवा क्षेत्र में साहब सलाम फैलाया। रीवा राजा जब स्वयं इनका शिष्य हो गया तो 'साहब सलाम' राज्य का राजकीय अभिवादन बन गया।

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-लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।