आम आदमी

-शशिकांत त्रिवेदी का व्यंग्य स्तंभ 'व्यंग्य वचन मत बोल'

 

आम आदमी का जन्म कब, कहां और कैसे हुआ, यह किसी को पुख्ता रूप से नहीं पता, लेकिन आम आदमी शुरुआत से लेकर आज तक आम आदमी ही है, इस बात में कोई दोमत नहीं है। आम आदमी के बीच से कुछ लोग निकलकर खास बन गए; आम आदमी के नाम पर मठ बन गए, मठाधीश बन गए किन्तु आम आदमी अभी भी जस का तस ही है- खालिस आम आदमी।


दरअसल, आम आदमी इस देश की सबसे सुरक्षित प्रजाति है। जंगल में बाघ कम हो रहे हैं, नदियों में पानी कम हो रहा है, राजनीति में नैतिकता कम हो रही है, लेकिन आम आदमी भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। वह हर गली, हर दफ्तर, हर बस स्टैंड और हर चाय की दुकान पर पाया जाता है। उसके चेहरे पर स्थायी चिंता रहती है और जीवन में स्थायी आलस्य।


वह सुबह अखबार पढ़ते हुए देश बचा लेता है और शाम तक अपनी टूटी हुई कुर्सी ठीक नहीं कर पाता। उसके पास हर समस्या का विश्लेषण है, समाधान नहीं। समाधान मेहनत मांगता है और आम आदमी मेहनत को ऐसे देखता है जैसे सरकारी दफ्तर में बाबू फाइल को देखता है —  'रख दो, देखेंगे।'


आम आदमी परिवर्तन का सबसे बड़ा समर्थक होता है, बशर्ते परिवर्तन किसी दूसरे के घर में हो। उसे लगता है कि देश तभी सुधरेगा जब लोग सुधरेंगे। यहाँ  'लोगÓ से उसका मतलब हमेशा बाकी लोग होते हैं। वह स्वयं को पहले से ही राष्ट्रनिर्माण की अंतिम अवस्था में मानता है।


आम आदमी ट्रैफिक जाम में फंसकर देश की व्यवस्था को कोसता है और फिर रेड सिग्नल तोड़कर निकल जाता है। उसे भ्रष्टाचार से बहुत नफरत है, लेकिन वह चाहता है कि भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत उससे न हो, दूसरे करें। वह काम जल्दी करवाने के लिए जेब में पांच सौ का नोट अलग मोड़कर रखता है। वह कहता है —  'सिस्टम ही ऐसा है।Ó वैसे यह वाक्य आम आदमी के लिए राष्ट्रीय गान जैसा है।


आम आदमी अपने बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है और स्कूल में एडमिशन के लिए सिफारिश ढंूढ़ता है। वह बच्चों से कहता है —  'बेटा, जीवन में बड़ा आदमी बनना।' लेकिन जैसे ही बच्चा कोई बड़ा सपना देखता है, वह तुरंत उसे समझा देता है —  'ज्यादा उड़ो मत, गिर जाओगे। 'असल में आम आदमी को उड़ने वालों से डर लगता है। उसे लगता है कि अगर आसपास कोई बहुत आगे निकल गया तो उसकी अपनी साधारणता उजागर हो जाएगी। इसलिए वह हर सफल आदमी में पहले कमी ढूंढ़ता है। कोई मेहनत से सफल हुआ हो तो वह कहेगा —  'भाग्य अच्छा था।' कोई ईमानदारी से आगे बढ़ गया हो तो बोलेगा —  'देखना, कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होगी।'


आम आदमी अपनी आदतों को विरासत की तरह संभालकर रखता है। सुबह देर से उठना, काम टालना, समय पर न पहुंचना, हर असफलता का दोष सरकार पर डालना — यह सब उसके सांस्कृतिक मूल्य हैं। वह अपनी कमजोरियों को इतनी आत्मीयता से पालता है जैसे लोग पुराने मकान में तुलसी का पौधा पालते हैं।


उसे हर नई चीज से परेशानी होती है। ऑनलाइन व्यवस्था आई तो बोला —  'पुराने तरीके अच्छे थे।' नई शिक्षा नीति आई तो बोला —  'हमारे समय में पढ़ाई होती थी।Ó सड़क चौड़ी हुई तो बोला —  'पहले अच्छा था।' याने आम आदमी की सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि दुनिया बदलती रहे, बस उसकी आदतें न बदलें।


वह देश की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करेगा, लेकिन बिजली का बिल आखिरी तारीख के बाद भरेगा। स्वच्छता पर भाषण देगा और मूंगफली के छिलके ट्रेन की सीट के नीचे डाल देगा। लोकतंत्र बचाने के लिए सोशल मीडिया पर क्रांति करेगा और वोट वाले दिन घर में सोता रहेगा।


सबसे अद्भुत बात यह है कि आम आदमी कभी खुद को आम नहीं मानता। उसे लगता है कि देश में जितनी समस्याएं हैं, वे बाकी आम आदमियों की वजह से हैं। वह स्वयं को थोड़ा विशेष मानता है — जैसे हर सरकारी कर्मचारी खुद को पूरे विभाग का अकेला ईमानदार आदमी मानता है।


सही मायनों में, आम आदमी की जिंदगी  'चलता है' के दर्शन पर टिकी होती है। उसके सपने भी पूरे जोश से नहीं दौड़ते, चप्पल घसीटते हुए चलते हैं। वह जोखिम से डरता है, मेहनत से बचता है और फिर सफल लोगों की जीवनी पढ़कर प्रेरित होता है। प्रेरणा लेते-लेते उसे नींद आ जाती है। फिर सुबह उठकर वही चाय, वही शिकायत, वही व्यवस्था, वही दोषारोपण। और इसी निरंतरता का नाम शायद इस देश में  'आम आदमी' है।