व्यंग्य: ' जो है जो, वही नहीं है '

- लेखक, व्यंग्यकार, चिंतक-विचारक, वरिष्ठ पत्रकार शशिकांत त्रिवेदी का कॉलम - व्यंग्य वचन मत बोल

 

पना देश बड़ा अद्भुत है। यहां आदमी का परिचय उसके पेशे से नहीं, उसके सपनों से होता है। और सपने भी ऐसे कि जो काम उसके पास है, उससे उसे उतनी ही नफरत है जितनी सरकारी दफ्तर में बैठे बाबू को 'खाली जेब जनता' से होती है। यहां डॉक्टर, डॉक्टर नहीं है। वह असफल उद्योगपति है जो मजबूरी में मरीज देख रहा है। इंजीनियर, इंजीनियर नहीं है। वह नेता है जिसे गलती से ड्राइंग शीट पकड़ा दी गई है। शिक्षक, शिक्षक नहीं है। वह कृषक है, एलआईसी अभिकर्ता है, भू-माफिया है, लेकिन शिक्षक भर नहीं है। पत्रकार, पत्रकार नहीं है। वह भावी ठेकेदार है जो पत्रकारिता के भंवर में क्यों फंसा है, न वह जानता है और न पत्रकारिता ही जानती है। वैसे, पढ़ने - लिखने से अब न तो शिक्षकों का कोई वास्ता है और न ही पत्रकारों का।

 


अपने देश में जो व्यक्ति जो भी है, वही नहीं है। और जो नहीं है, वही बनने की कोशिश में जीवन गुजार देता है। एक विधायक जी ने एक बार मुझसे कहा-  'हम तो ठेकेदारी के धंधे को बचाने के लिए राजनीति के धंधे में आ गए। नहीं तो कौन.... इस बवाल में पड़ता। सुबह से जिसको देखो चला आ रहा है अपनी समस्या लिए। न ठीक से खा पाते हैं, न ठीक से सो पाते हैं। बेडरूम तक में घुस जाते हैं लिए फरियाद। इनको तो गाली देकर भगा भी नहीं सकते, वोट भी इन्हीं से लेना है।'  मैंने पूंछा- '...और जनसेवा।' नेताजी बोले -  ''सब स्वार्थी हैं... सोचते हैं फ्री में काम हो जाए और ...वोट देंगे पैसा लेकर। हम भी व्यापारी हैं, सब समझते हैं।''

 


 सरकारी दफ्तरों में अफसर जनहित के कामों में कम और अपने निजी उद्यमों की  प्रोजेक्ट रिपोर्ट में ज्यादा डूबे रहते हैं। उनकी मेज पर दो फाइलें रहती हैं- एक सरकार की और दूसरी अपनी। फर्क सिर्फ इतना है कि सरकारी फाइल पर धूल जमा होती है और अपनी फाइल पर उंगली के निशान भी नहीं पड़ने देते। डॉक्टर साहब की स्थिति कुछ ज्यादा ही करुण है। मरीज उनके सामने बैठा खांस रहा है, मगर उनके दिमाग में रिसॉर्ट की योजना घूम रही है। स्टेथोस्कोप से छाती कम सुनते हैं, धरती ज्यादा टटोलते हैं। उन्हें लगता है कि आदमी के फेफड़ों से ज्यादा संभावनाएं होटल- रेस्त्रां में हैं।

 


उधर शिक्षक महोदय ज्ञान बांटने नहीं, जमीन नापने निकले हैं। विद्यालय उनके लिए विश्रामगृह है और तहसील कार्यालय कर्मभूमि। बच्चा पूछता है—  'सर, भारत की राजधानी क्या है?' गुरुजी कहते हैं—  'पहले यह बताओ हाईवे किनारे वाले प्लॉट का वर्तमान रेट क्या है?' बच्चा घर जाकर पिता से पूछता है—  'पापा, दिल्ली राजधानी है या निवेश का अच्छा विकल्प?' गांव के विद्यालय के एक लेक्चरर तो ऐसे हैं जो दिन भर में कई रूप धरे मिलते हैं। सुबह सबसे पहले वे किसान होते हैं, फिर वे ग्वाला बनकर दुग्ध व्यवसाय को मजबूत करते हैं। उसके बाद वे गल्ला व्यापारी के रूप में देश को विकास पथ पर ले जाने के काम में लगे होते हैं। फिर वे लेक्चरर बनकर विद्यालय के स्टाफ रूम में महिला सहकर्मियों को लेक्चर देते हैं, कल न्योते मेें क्या अच्छा बना था और कहां अच्छी व्यवस्था थी- इस विषय  पर विमर्श करते हैं। स्टाफ रूम से ही वे एलआईसी एजेंट हो जाते हैं और विद्यालय के बाद वे अपने बीमाधारकों से मुलाकात करते हुए फिर से क्रमश: गल्ले की दुकान, किसान और ग्वाला होकर अपने दिन का समापन करते हैं।  

 


इंजीनियरों ने तो कमाल ही कर दिया है। पुल बनाते हैं ऐसे जैसे मन कहीं और हो। क्योंकि मन सचमुच कहीं और होता है। उनका शरीर निर्माण स्थल पर और आत्मा सीमेंट-बालू, सरिया-गिट्टी के कमीशन का हिसाब कर रही होती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे इंजीनियर साहब ने बीटेक के साथ ही कमीशन का ब्रिज कोर्स किया है। इसलिए कई पुल उद्घाटन से पहले ही लोकतंत्र की तरह चरमराने लगते हैं। इंजीनियर साहब का मन इंजीनियरिंग के अलावा बाकी तमाम कामों के लिए भटकता है। वे नेता बनना चाहते हैं, बिल्डर बनना चाहते हैं, ठेकेदार बनना चाहते हैं, उद्योगपति बनना चाहते हैं... बस इंजीनियरिंग में उनका मन फटफटाता है। 


पत्रकार भी दुर्घटना का शिकार होकर पत्रकारिता में आता है। उसे पता ही नहीं होता कि वह कब, कहां, क्यों और कैसे पत्रकारिता में आ गया। पत्रकारिता में आकर उसे पता चलता है कि इस काम में खबर लिखनी पड़ती है और लिखने के लिए पढ़ना पड़ता है, मेहनत करना पड़ता है। दोनों ही अगर उसे करना होता तो वह भला पत्रकारिता में क्यों आता? इसी उलझन में वह पत्रकारितायेत्तर गतिविधियों में शामिल हो जाता है।


एक बार, एफएमसीजी के एक बड़े डिस्ट्रीब्यूटर ने मुझे बताया था कि टोमैटो केचप में टोमैटो नहीं होता। तो मैंने पूंछा कि फिर क्या होता है? उसने बताया कि टोमैटो केचप में कद्दू होता है, टोमैटो का कलर होता है और आम-इमली का अमचूर होता है। ऐसे ही जो दिखता है, जो जिसके लिए पहचाना जाता है, वही नहीं होता है। पुलिस वाले कानून से कम और उगाही से ज्यादा परिचित हैं। वकील अदालत से ज्यादा राजनीतिक मंचों पर दिखाई देते हैं। कृषि विशेषज्ञ खेती से ज्यादा सरकारी योजनाएं बेचते हैं। और नेता जनता से ज्यादा अपनी आने वाली सात पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करते हैं। इतना दूरदर्शी समाज दुनिया में शायद ही कहीं मिलेगा।


समस्या यह नहीं कि लोग पैसा कमाना चाहते हैं। पैसा कमाना तो निहायत ही पुण्य का काम है। समस्या यह है कि हर आदमी अपने असली काम को बोझ और दूसरे के काम को अवसर मानता है। उसे लगता है कि सफलता हमेशा पड़ोसी के खेत में उगती है। नतीजा यह है कि हर क्षेत्र में कुर्सियां विशेषज्ञों से भरी हैं और काम नौसिखियों जैसा हो रहा है। स्कूल हैं, पर शिक्षा नहीं है। अस्पताल हैं, पर इलाज नहीं है। दफ्तर हैं, पर जवाबदेही नहीं है। अखबार हैं, पर खबर नहीं है। देश धीरे-धीरे ऐसे लोगों का विशाल सम्मेलन बनता जा रहा है जो अपने पेशे में उपस्थित और अपने काम से अनुपस्थित हैं। शायद इसी कारण हमारे यहां गुणवत्ता दुर्लभ और बहाने प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।


जिस दिन डॉक्टर को डॉक्टर बनने में गर्व होगा, शिक्षक को पढ़ाने में आनंद आएगा, इंजीनियर को निर्माण से प्रेम होगा, रिसर्चर को शोध में परम आनंद मिलेगा, पत्रकार को खबर लिखने का जुनून होगा और अफसर को शासन चलाने में संतोष मिलेगा, उस दिन देश बदलने के लिए किसी मसीहा की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि पूरा देश अपने-अपने काम से भाग रहा है और फिर हैरान है कि मंजिल क्यों नहीं मिल रही।