अस्तित्व बचाने का संकल्प

- लेखक, चिंतक-विचारक, वरिष्ठ पत्रकार शशिकांत त्रिवेदी की विश्व पर्यावरण दिवस पर सम्पादकीय 

 

रती का बढ़ता तापमान आज केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आम जनजीवन की प्रत्यक्ष अनुभूति बन चुका है। कुछ दशक पहले तक मई-जून की गर्मी जिस स्तर पर महसूस होती थी, आज वैसी ही तपिश मार्च और अप्रैल में देखने को मिल रही है। देश के अनेक हिस्सों में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है। लू के दिनों की संख्या बढ़ रही है, जल स्रोत सूख रहे हैं और मौसम का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। आज विश्व पर्यावरण दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब पर्यावरण संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन चुका है।

 


जानकार बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण प्रकृति के साथ मनुष्य का असंतुलित हस्तक्षेप है। औद्योगिकीकरण, अनियंत्रित शहरीकरण, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग और सबसे बढ़कर वनों की लगातार कटाई ने धरती के प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। पेड़ केवल हरियाली का प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब जंगल घटते हैं, तब केवल पेड़ नहीं कटते, बल्कि जलवायु, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की पूरी श्रृंखला प्रभावित होती है।

 


हाल ही के कुछ वर्षों में आबादी के भीतर वन्य जीवों की आवाजाही तेजी से बढ़ी है। वनों के सिकुड़ने का असर वन्यजीवों पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण जंगली पशु-पक्षी मानव बस्तियों की ओर आने को मजबूर हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। दूसरी ओर, कई दुर्लभ प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन की विविधता के लिए भी गंभीर खतरा है।

 


पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकारों ने अनेक योजनाएं और अभियान शुरू किए हैं, लेकिन चुनौती इतनी बड़ी है कि केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकते। वृक्षारोपण को जन आंदोलन बनाना होगा। अक्सर देखा जाता है कि पर्यावरण दिवस पर लाखों पौधे लगाने की घोषणाएं होती हैं, लेकिन उनके संरक्षण और देखभाल पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। वास्तविक सफलता तब होगी, जब लगाए गए पौधे वृक्ष बनकर आने वाली पीढ़ियों को छाया, स्वच्छ हवा और सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करें। इसके साथ ही विकास की अवधारणा को भी पर्यावरणीय दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। सड़क, भवन और उद्योग जरूरी हैं, लेकिन उनकी योजना प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और हरित परिवहन जैसे उपायों को प्राथमिकता देना समय की मांग है। पर्यावरण संरक्षण बगैर हर व्यक्ति की भागीदारी फलीभूत नहीं हो सकता, हमें इस सार्वभौमिक सत्य को समझना ही होगा।

 


विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर है कि हम अपनी धरती को भविष्य की पीढ़ियों के लिए किस रूप में छोड़कर जा रहे हैं। यदि आज भी हम पर्यावरण संरक्षण को गंभीरता से नहीं लेते, तो आने वाले वर्षों में बढ़ती गर्मी, जल संकट और प्राकृतिक आपदाएं मानव जीवन को और कठिन बना देंगी। इसलिए आवश्यकता केवल जागरूकता की नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प और निरंतर प्रयास की है। तभी विश्व पर्यावरण दिवस की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी और धरती को रहने योग्य बनाए रखने का हमारा दायित्व पूरा हो सकेगा।