सिस्टम को सचमुच रिफॉर्म कर सकता है यूनिफॉर्म
- लेखक, व्यंग्यकार, वरिष्ठ पत्रकार शशिकांत त्रिवेदी की विशेष संपादकीय
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र-छात्राओं के लिए यूनिफॉर्म अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक आदेश लगता है, लेकिन वास्तव में इसके भीतर व्यवस्था, अनुशासन और संस्थागत संस्कृति को लेकर एक बड़ा संकेत छिपा है। वस्तुत: यूनिफॉर्म केवल कपड़ों का मामला नहीं होता; वह किसी भी व्यवस्था के चरित्र, उसकी गंभीरता और उसके सार्वजनिक व्यवहार का दृश्य प्रतीक है।
हमारे भारतीय समाज में यूनिफॉर्म को प्राय: स्कूलों, पुलिस या सेना तक सीमित दृष्टि से देखा गया है। जबकि दुनिया की तमाम संगठित व्यवस्थाओं ने बहुत पहले समझ लिया था कि पहचान और अनुशासन का संबंध केवल नियमों से नहीं, बल्कि दृश्य संरचना से भी होता है। कोई भी व्यवस्था तब अधिक विश्वसनीय दिखाई देती है, जब उसकी पहचान स्पष्ट हो, उसकी भूमिका समझ में आए और उसके प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से जवाबदेह महसूस करें। यहीं से यह प्रश्न उठता है कि यदि शिक्षा परिसरों में समानता और अनुशासन के लिए यूनिफॉर्म आवश्यक माना जा सकता है, तो क्या समूचे सरकारी तंत्र में भी इसे व्यापक रूप से लागू करने पर गंभीर विचार नहीं होना चाहिए?
दरअसल, आज भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी समस्या उसकी 'अदृश्यता' है। आप किसी सरकारी कार्यालय में जाइए-वहां अक्सर यह समझने में कठिनाई होती है कि कर्मचारी कौन है, अधिकारी कौन है और जिम्मेदार व्यक्ति कौन है। कई बार पूरा वातावरण इतना अनौपचारिक दिखाई देता है कि नागरिक स्वयं असहज हो जाता है। व्यवस्था मौजूद रहती है, लेकिन उसका अनुशासन दिखाई नहीं देता।
इसके विपरीत, निजी क्षेत्र को देखिए। किसी भी कॉर्पोरेट कार्यालय, बैंक, अस्पताल, होटल, एयरलाइन या बड़े शोरूम में प्रवेश करते ही व्यवस्था अपनी पहचान के साथ सामने खड़ी दिखाई देती है। यूनिफॉर्म और आईडेंटिटी कार्ड वहां केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति का हिस्सा हैं। ग्राहक को तुरंत समझ आ जाता है कि कौन किस जिम्मेदारी में है। इससे संवाद सरल होता है, समय बचता है और जवाबदेही स्वत: निर्मित होती है।
संभव है कि निजी क्षेत्र की कार्यकुशलता के पीछे तकनीक, प्रतिस्पर्धा और बेहतर प्रबंधन जैसे अनेक कारण हों, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वहां 'दिखने वाला अनुशासनÓ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यूनिफॉर्म व्यक्ति को केवल कर्मचारी नहीं रहने देती; वह उसे संस्था का प्रतिनिधि बना देती है। शायद यही कारण है कि निजी क्षेत्र में कार्यसंस्कृति अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित, संगठित और उत्तरदायी दिखाई देती है।
सरकारी तंत्र में भी पुलिस, सेना, रेलवे या आपदा सेवाओं जैसे विभागों में यूनिफॉर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वर्दी या गणवेश वहां अधिकार के साथ-साथ दायित्व का भी प्रतीक बन जाती है। वर्दी या गणवेश पहनने वाला व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसका व्यवहार अब केवल निजी नहीं, बल्कि संस्थागत महत्व रखता है। यही भाव नागरिक प्रशासन में भी विकसित किया जा सकता है।
निश्चित रूप से यह विचार बहस का विषय हो सकता है। अलग-अलग विभागों की प्रकृति, खर्च, जलवायु और कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे प्रश्न उठेंगे। लेकिन यह बहस केवल कपड़ों की नहीं है; यह प्रशासनिक संस्कृति की बहस है। यह उस मानसिकता की चर्चा है जिसमें व्यवस्था खुद को नागरिक के सामने अधिक स्पष्ट, अधिक उत्तरदायी और अधिक अनुशासित रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। और शायद इसी अर्थ में कहा जा सकता है- समूचे सिस्टम को सचमुच रिफॉर्म कर सकता है यूनिफॉर्म।