बलिहारी गुरु आपकी...

- वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, व्यंग्यकार शशिकांत त्रिवेदी का व्यंग्य स्तंभ 'व्यंग्य वचन मत बोल'

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Shashikant Triwedi

मारे देश में शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है। यह बात अलग है कि राष्ट्र कैसा बन रहा है, इसका जिम्मेदार कोई बनना नहीं चाहता है। हर साल शिक्षक दिवस पर बड़े-बड़े लोग मंच पर खड़े होकर कहते हैं - ' मैं आज जो कुछ भी हूं, अपने गुरुजी की वजह से हूं।' यह सुनकर गुरुजी भावुक हो जाते हैं। लेकिन सालों से यह प्रश्न मेरे दिमाग में उमड़- घुमड़ रहा है कि जो आज कुछ भी नहीं है, वह किसकी वजह  से है?


हमारे यहां शिक्षक एकमात्र ऐसा प्राणी है जो नौकरी लगते ही मनुष्य से 'उपदेशक' में बदल जाता है। उसके बाद वह जीवन कम जीता है, भाषण ज्यादा देता है। विद्यालय में सुबह का दृश्य देखिए। पहली कक्षा का विद्यार्थी पांच मिनट देर से पहुंचा है। प्रार्थना में शामिल नहीं किया गया है, गेट के बगल में खड़ा कर दिया गया है। स्कूल प्रबंधन के लोग डांट और उपदेश की डोज दे रहे हैं। बच्चे की सहमी आंखों में आंसू हैं। अचानक बच्चे के क्लास टीचर का विद्यालय आगमन होता है। चेहरे पर मुस्कान, हाथ में हेलमेट और होंठों पर वही राष्ट्रीय बहाना—Ó ट्रैफिक बहुत था।'  ट्रैफिक हमेशा गुरुजी के रास्ते में ही आता है। बच्चे अपने अभिभावक के साथ शायद सुरंग बनाकर विद्यालय पहुंचते होंगे।


बच्चा अगर बेल्ट लगाना भूल गया है तो अनुशासन खतरे में पड़ जाता है। जूते पॉलिश नहीं हैं तो राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय घोषित कर दिया जाता है। लेकिन गुरुजी ! कोई हरे तोते वाली शर्ट पहनकर आ रहे हैं, कोई ऐसे चमक रहे हैं जैसे स्कूल नहीं, कव्वाली में जा रहे हों। कई शिक्षक तो इतने रंगीन होकर स्कूल पहुंचते हैं कि स्कूल स्टाफ पढ़ाई - लिखाई की बजाय उनकी सजावट की चर्चा में मशगूल हो जाता हैं। विद्यालय में बच्चे को सिखाया जाता है— 'सादा जीवन, उच्च विचार।' और यह वाक्य पढ़ाने वाले गुरुजी मोबाइल पर ईएमआई का हिसाब लगा रहे होते हैं।


शिक्षकों में एक और अद्भुत गुण पाया जाता है— स्थायी पीड़ा। उन्हें हमेशा लगता है कि संसार में सबसे अधिक शोषित प्राणी वही हैं। डेढ़ लाख वेतन पाने वाले  सरकारी गुरुजी भी ऐसे कराहते हैं जैसे अंग्रेज अभी-अभी उनका खेत नीलाम करके गए हों। जनगणना में ड्यूटी लग गई— शिक्षा जगत का अपमान। मतदान में लगा दिया— लोकतंत्र खतरे में। कॉपी जांचने को कह दिया— मानसिक उत्पीड़न। गुरुजी चाहते हैं कि वे अपने टाइम पर विद्यालय आएं, क्लासरूम में सदाचार के उपदेश दें, स्टाफ रूम में हंसी-मजाक के साथ चाय पिएं और राष्ट्र निर्माण का कार्य ईश्वर पर छोड़कर घर लौट जाएं। बाकी समय ज्ञापन देंगे, अटेंडेंस एप का विरोध करेंगे, पात्रता परीक्षा के खिलाफ लामबंदी करेंगे।


हमारे यहां शिक्षा से ज्यादा स्थायी अगर कुछ है, तो शिक्षकों की मांगें हैं। आए दिन धरना, प्रदर्शन और हर सरकार में पीड़ाएं। ऐसा लगता है जैसे शिक्षा विभाग नहीं, दुखी आत्माओं का सांस्कृतिक मंच हो। सबसे करुण दृश्य तब बनता है जब गुरुजी बच्चों से कहते हैं— 'बेटा, सीखना कभी बंद मत करना।' ये वही गुरुजी होते हैं जिन्होंने नौकरी लगने के बाद किताब को ऐसे त्याग दिया होता है जैसे साधु संसार त्याग देता है। कई शिक्षकों का ज्ञान उसी साल रुक गया, जिस साल उनकी नियुक्ति हुई थी। उसके बाद दुनिया बदलती रही— भाषा बदली, समाज बदला, बच्चे बदले— लेकिन गुरुजी आज भी उसी नोट्स से पढ़ा रहे हैं जिसमें  'नई शिक्षा नीति' के नाम पर अब छिपकलियां अंडे दे रही हैं। 


आज हालत यह है कि हजार पढ़े-लिखे लोगों में मुश्किल से दस लोग शुद्ध हिंदी में आवेदन पत्र लिख पाते हैं। 'सेवा में, श्रीमान...' लिखते ही हाथ कांपने लगते हैं। 'महोदय' में मात्रा कहां लगेगी, यह गूगल से पूछा जा रहा है। एम.ए. पास आदमी लिख रहा है— 'मुझे दो दिन का अवकाश देने की कृपा करें, क्योंकि मेरे पेट में दर्द हो रहे हैं।' और यह वही देश है जहां तमाम विद्यालयों के बाहर लिखा है— 'यहां भविष्य बनाया जाता है।' भविष्य इतना बनाया जा चुका है कि आज के युवा न हिंदी के हैं, न अंग्रेजी के। न किताब के और न ही विचार के। ज्ञान व्हाट्सऐप से ले रहे हैं और तर्क रील्स से। विद्यालय अब शिक्षा के मंदिर कम, प्रमाण पत्र वितरण केंद्र ज्यादा लगते हैं।


फिर भी शिक्षक दिवस आएगा। बच्चे गुलाब देंगे, उपहार देंगे। नेता भाषण देंगे। गुरुजी सम्मानित होंगे। और अगले दिन वही बच्चा आवेदन पत्र में लिखेगा— 'सर, कल मैं स्कूल नहीं आऊंगा क्योंकि मुझे गांव जाना हैं। 'गुरुजी लाल पेन से  'हैं' काट देंगे। शिक्षा व्यवस्था निश्चिंत हो जाएगी कि सुधार जारी है...