Rewa News: रीवा के प्रयास रंग समूह ने 'चाय अकेली है' का किया प्रभावपूर्ण मंचन
शानदार प्रस्तुति ने नए कलाकारों को मंच देकर रंगकर्म की परंपरा को प्रदान की नई ऊर्जा
रीवा। सांझ की हल्की सुनहरी धूप जब पेड़ों की पत्तियों से छनकर मुक्ताकाशी मंच पर उतर रही थी, उसी वातावरण में विंध्य की अग्रणी रंग संस्था प्रयास रंग समूह ने रंग निर्देशक हीरेन्द्र सिंह द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक 'चाय अकेली है' का प्रभावपूर्ण मंचन किया।
लगभग पैंतालीस वर्षों से सांस्कृतिक सरोकारों और सृजनात्मक गतिविधियों के लिए पहचानी जाने वाली इस संस्था ने इस प्रस्तुति में सर्वथा नए कलाकारों को मंच देकर रंगकर्म की परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करने का कार्य किया है।
नाटक मध्यम वर्गीय जीवन की उस मौन पीड़ा को उजागर करता है जो रोजमर्रा की भागदौड़ में अनकही रह जाती है। जैसे किसी थके हुए पथिक को छायादार वृक्ष के नीचे कुछ क्षणों का विश्राम मिल जाए, वैसे ही इस कथा का नायक खुली खिड़की के पास बैठकर एक प्याली चाय के साथ सुकून के कुछ पल तलाशता है, परंतु विडंबना यह है कि अपनों से घिरे रहने के बावजूद वह अपने ही घर में अजनबी-सा महसूस करता है।
कथा में हास्य और व्यंग्य के झोंकों के बीच मानवीय संबंधों की जटिलताएँ और सामाजिक संशय की धुंध दिखाई देती है। आर्थिक दबावों के बीच पिसता मध्यम वर्ग कभी-कभी भावनाओं की भाषा भूलकर संदेह और असहजता के जाल में उलझ जाता है। नाटक इसी विडंबना को पूर्ण संवेदनशीलता से प्रस्तुत करता है और अंतत: दर्शकों को मार्मिक अनुभूति के साथ कुछ प्रश्नों के साथ छोड़ जाता है।
अभिनय पक्ष में राजेश शुक्ल 'राजन' ने परमानंद व्यथित के रूप में संवेदनशील अभिनय किया, सत्येन्द्र सेंगर (विनय) और ज्योति मिश्रा (सुरभि) ने पात्रों के मनोभावों को सजीव किया।
पड़ोसी मिस्टर वर्मा की भूमिका में रमज़ान खान और वर्माइन जी के रूप में प्रभा मिश्रा स्वाभाविक लगे, कवित्री राधिका के रूप में अनुराधा पांडेय ने बेहतर प्रभाव छोड़ा, जबकि आशीष मिश्रा ने एक खुन्नस खाए हुए कवि के चरित्र को रोचकता के साथ निभाया।
इस नाटक में प्रकाश संयोजन शैलेंद्र द्विवेदी और ध्वनि संयोजन शालिवाहन सिंह द्वारा बेहतरीन ढंग से किया गया। दर्शक दीर्घा भी समृद्ध रही, दर्शकों की प्रतिक्रिया में यह सामने आया कि कविताओं के सुंदर प्रयोग और बेहतर अभिनय एवं निर्देशन की बदौलत नाटक प्रभावी संवेदनशील और प्रखर रहा है।